“कबीरा खड़े बाजार में सब की मांगे खैर ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर”, आज भी प्रासंगिक हैं रैदास के विचार

राजू शर्मा की रिपोर्ट :

पश्चिमी चंपारण : मझौलिया प्रखंड क्षेत्र के भिन्न भिन्न जगहों पर संत कबीर जयंती मनाया गया । रैदास का जन्म माघी पूर्णिमा के दिन काशी यानी वर्तमान बनारस / वाराणसी में हुआ था । हालाकि उनके जन्म साल को लेकर कुछ विवाद होता रहा। कुछ का मानना है कि उनका जन्म 1378 में हुआ था, जबकि विद्वानों ने इसे 10 साल बाद बताया 1398 में हुआ था ।

प्राचीन मान्यता के अनुसार संत रविदास को संत कबीर का समकालीन माना जाता है। साथ ही यह अभी कहते हैं कि ये मीरा बाई उन्हें अपना गुरु मानती थीं । कहते है कि रविदास जी की प्रतिभा से सिकंदर लोदी भी काफी प्रभावित प्रभावित हुआ था और उन्हें दिल्ली आने का अनुरोध किया था । उनके द्वारा रचित 40 पद सीखो के पवित्र ग्रंथ गुरुग्रंथ साहब में भी किये गये है । मूर्तिपूजा तीर्थयात्रा जैसी दिखवो और पाखंडो में उनकी आस्था नही थी । वे सहज व्यवहार और शुद्ध अंतःकरण को ही सच्ची भक्ति मानते थे । इसलिए वह घर पर ही स्नान करके गंगा को प्रणाम करते थे और उनकी पूजा हो जाती थी।

तभी से यह कहावत प्रचलित हुई कि “मन चंगा तो कठौती में गंगा ” जानकारी के लिए बता दें कि संत कबीर महान तत्वदर्शी थे । भ्रम निवारण के लिए उनकी वाणी आज ही कल्याणकारी है। कबीर साहब समाजिक अध्यात्मिक एवं धार्मिक सुद्राओं के उद्घोषक थे। सभी धर्मों का संप्रदायों को उन्होंने आदर भाव के उद्घोषक थे। 500 वर्ष पहले जो उनकी वाणी से प्रकट हुई थी वह आज भी सबके लिए प्रासंगिक व कल्याणकारी है ।

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